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नमस्कार मित्र आणि मैत्रिणींनो ... माझ्या ब्लॉगवर आपले स्वागत आहे..

4/1/20

Compassion and Love in Corona times

Next few Weeks are going to be very difficult, emotionally and financially.
Stay isloted yet emotionally together.
Take care of urself both physically and emotionally.
Open up if you feel panic, anxious or frustrated.
Love each other.
Help each other.
Show affection. 
Hold each other in these collapsing times.
Give More attention and care to elderly.
Give freedom of expression to Children.
Give extra emotional support and special love to Ur loved ones, who seem to be losing the temper and breaking down mentally.
Give helping hands and financial help to those marginalised and neglected people around.
Learn new ways of Communication.
Adopt new styles of work.
Avoid travel in Corona and post Corona too.
We have to cancel all old plans but we will design new plans. 
It doesn't matter at all to let go of old ways. If we survive, we will start newly.
Let's be together in this Corona times and build circle of Safety, Security and Love to everybody around us.
♥️♥️♥️♥️♥️
youtube channel - Ayshwarya Revadkar
https://youtu.be/R0iTkeH_UW8

Part 3 - इतिहास के पन्नो में पढ़ा था

Day 7 lockdown : Poem in Solidarity with  Courage and sufferings of Migrants and
to Salute front line health and Safai workers, Ngos, Volunteers who are helping to feed poor and The exceptional Proactive Govt officers who are helping the vulnerable people.
youtube link https://youtu.be/X_BojuAUjvQ

Thanks to डॉ.सुनील अभिमान अवचार for giving permission to use sketches by him. His sketches give power to my words.

इतिहास के पन्नो में पढ़ा था 
की हुआ था देश का बटवारा आज़ादी के वक़्त 
धर्म के आधार पर लोगो को मजबूर कर दिया था चुनने अपने देश 
और निकल पड़े थे  पैदल कंधो पे घर बटोरे हुए कई किलोमिटर्स की यात्रा पर.
वो एक मानवीय प्रवास का दुःखभरा दौर था,
और आज, जो मेरे तुम्हारे आँखों के सामने  
साकार हो रहा है फिर से एक मानवीय प्रवास. बेहद दर्द भरा.
हवाई जहाज से आई हुयी महामारी ने  शुरुवात की,
और साथ दिया गरिबी, पेट की भूख और मौत के डर ने
और इन मजदूरो के बारे में बिना सोचे घोषित हुए इमर्जन्सी लॉकडाउन ने.
लोग चल पड़े है शहरो से गावो की तरफ.
और सरकार इनको कोई साधन, छत, खाना, बसे कुछ भी सहारा  देने के बजाए
ढा रही है जुल्म.
 कही बनाये जा रहे है उनके लिए नए कारावास.
 कही डंडे, लाठिया से पिटाई ,
 तो कही केमिकल स्प्रे से हो रही उनकी धुलाई.

घर पहुँच जाने की आस लिए पैदल जाने वाले 
कुछ रास्ते में ही तोड़ रहे है दम.
और जो जिन्दा पहुचेंगे, क्या वे दाखिल हो पाएंगे  गाव के अन्दर ?
क्या गाव का दरवाजा खुलेगा उनके लिए ? 
पता नहीं.
कोरोना के अज्ञान से और डर से गाव के गाव हो गए है 
बंद.
दम तोड़ रहे है लोग भूख से, गरीबी से, अन्य कई बीमारियों से.
बटवारे का एक  वो इतिहास पढ़ के मै फुट फुट कर  रो पड़ी थी.
और आज फिर उसी तरह का ये  मानवीय प्रवास  देख कर 
दिल बैठ गया है.

घरो में सुरक्षित बैठे हुए लोग चिल्ला रहे है , 
“ये सब कुछ ठीक हो रहा है.”
इन बेवकुफो को इतनी भी अक्ल नहीं की’
जिन हालातो से मजदूर आज गुजर रहे है, 
कल वे भी हो सकते है उन्ही हालातो के शिकार.
आज जो भूख चला रही है इन मजदूरो कोशहर से गावो तरफ,

वोही भूख, कल इकोनोमी गिरने के बाद 
हो जाएगी आप पर भी हावी.
और तब आप भी भूख से बिलखोगे, चिल्लाओगे, 
तब आप को मरता हुए देख बैठे होंगे कुछ लोग आपके भी ऊपर,
जो बोलेंगे “ये सब कुछ ठीक हो रहा है.”
ये मै नहीं कह रही,
इतिहास गवाह है.

कोरोना... कितनी  तरह से तोड़ोगे इंसानियत को ?
ये तुम तोड़ रहे हो या हम ही ऐसे है खोकले अन्दर से.?

मेरा अभिवादन हर उस डॉक्टर , नर्स और अस्पताल के हर एक कर्मचारी को, 
फिल्ड पे कार्यरत आशा, ए.एन. एम नर्सेस 
और सफाई कर्मचारियो को 
जो दे रहे है सेवाये मानवता के बचाव के लिये,
खुद खतरे का सामना करते हुये.

मेरा अभिवादन उन सब मजदूरो को, 
जो नही डरे सत्ता की मनमानी से , 
नहीं है वो कायर आप जैसे, जो डरते है सत्ता को प्रश्न पूछने.
खुद पर निर्भर वो निकल पड़े यात्रा पर. 
मेरा अभिवादन उन तमाम , इंसानियत को जिन्दा रखने वाले लोगों को 
 जो खिला रहे खाना इन मजदूरो को, दे रहे है छत और साथ में  हौसला.

मेरा अभिवादन उन सरकारी अफसरों को, जिन्हें है समझ समाज के इस कमजोर हिस्से की 
और चल पड़े है मदद पहुचाने हर उस आखरी इन्सान तक.

काश हम सब ये बात समझ पाए..
काश हम सब फिर से इन्सान बन जाए !!

Ayshwarya

visit youtube channel - Ayshwarya Revadkar for audio visual of this poem.

Part 2 : आ, तमाशा देख.

Day 6 Lockdown : Today our hearts wept by seeing video of Spraying sanitiser and chlorinated water over group of poor migrants in UP. 
Such a shameful day for humanity today.
Is it my Country ? Is it happening in Democracy ?

आ, तमाशा देख.
क्लोरिन वोटर स्प्रे से धुलवाओ सालो को.
ये लोग जो सहरो का कचरा उठाते है, सडको पे सोया करते है 
न जाने कहा कहा से, कौन से गन्दी बस्तियों से उठ आये है..
 निकल पड़े है फैलाने इनसे लिपटी 
न जाने कितनी पिढ़ियो की बरसो पुरानी गंदगी.  
क्या बोल रहे हो ?
भूख लगी है ? प्यासे हो ? घर जाना है ?
ये लो.. नंगे बदन पे डंडे खाओ.
अगर करते हो हिम्मत खुद से खड़े होने की
तो कुचले दिए जाओगे महासत्ता के बलशाली पैरो तले.!
 लोकतंत्र का महायज्ञ है चल रहा, 
इसमें आहुति चढने की भी काबिलियत नहीं तुम्हारी 
पूंजीवाद के महारथ के पैय्योतले जगह तुम्हारी 
शहरो की गन्दगी साफ़ करते हुए
 घिस घिस कर मर जाने की औकात तुम्हारी 
और ख़बरदार ! मुह से आह तक नहीं निकालो !!
ख़बरदार , मुह से आह तक नहीं निकालो !!
क्या तुम इन्सान हो ? क्या हम इन्सान है ?
तुम हो कीड़े सहर के नाली के, 
हम है सत्तावान मदमस्त हैवान !!
और ये बन बैठे है पत्थर के बुत
चुपचाप तमाशा देखने वाले इन्सान.
Ayshwarya.
Thanks to  डॉ.सुनील अभिमान अवचार for providing me sketches for video, his sketches speak louder than words. 

Name of youtube channel - Ayshwarya Revadkar
visit for audio video of this poem
YouTube link https://youtu.be/blhoo4QvEO4

Part 1 : ये लोग जो चिंटीयो जैसे दिख रहे है..

Day 5 Lockdown : many times, people ask me why I write. Answer is always same, I write because I suffer, I feel pain and so I write..not to die of pain. Writing is like breathing for me.
This time also, pain of our fellow countrymen gave rise to this poem.
Thanks to Praphull Thakur for giving valuable contribution of last lines which made poem complete.
Thanks to डॉ.सुनील अभिमान अवचार Dr. Sunil Abhiman Awachar for allowing me to use heart breaking sketches by him for this video.

ये लोग 
जो चिंटीयो जैसे दिख रहे है
सुपर पॉवर इंडिया नाम के 
एक महान देश के नक़्शे पर.
इनको मिटा देना चाहिये फेसबुक के पन्नो से
क्यूंकि शरीर के भद्दे हिस्से को नहीं जाहिर किया जाता इस तरह से ..!
एक महान लोकतंत्र में 
उनकी जगह है किसी पुलिया की निचे,
दूर किसी गन्दी बस्तीयों में, इमारतों के पिछवाड़े में
या बजबजाती नालियों के किनारे 
जहा दिन की रोशनी , प्रिविलेज लोगो की सोच और 
सरकार की पोलिसी नहीं पंहुचा करती.  
मजाल कैसे हुयी इन लोगो की
ऐसे यकायक ये उठे फूट पाथो से, गन्दी बस्तियों से ,
नालियों के किनारो से 
और चल दिए किसी की इजाजत लिए बगैर ?
हिम्मत कैसे हुई इनकी
अपनी ज़िंदगी का फैसला खुद करने की ?
वो हक़ तो हमने दिया है राजनेताओं को, अफसरों को 
या फैक्ट्री के मालिकों को
लेकिन ये किसी से डरे बिना
गांव जाकर 
घर में पानी पीने की लालसा लिए हुए
भूखे पेट, सैकड़ो-हजारों किलोमीटर का हिसाब किए बगैर 
चल पड़े पैदल
इनके  कदमों की चाल ने
हिला दिया एक महान लोकतंत्र को,
दहल गया इंसानियत का मन,  
इनकी  आंसुओं से भीग गए सोशल मिडिया के पन्ने
मैं आभारी हूं, उन तमाम फोटोग्राफर्स और रिपोर्टर्स की 
जिन्होंने छत के नीचे सोए हुए सुरक्षित लोगों को दिखाया
'अर्बन पुअर' कहलाने वाले इन चींटियों जैसे लोगों का अस्तित्व 
और ये कड़वा सच की 
ये लोग भी हिस्सा हैं
आज़ाद भारत का
जितना रोटी पर हमारा हक है
उतना ही, उनका भी है
उन्हें ना तो 
हक मिल रहा, न रोटी
शायद जल्द ही वे अपने घर ज़िंदा पहुंच जाएं
शायद जल्द ही उन्हें भारत के नक़्शे में मिल जाये
 'अपना' स्थान
लेकिन, अगर न पहुंच पाएं वो अपने घर
और रास्ते में ही तोड़ दिए दम
तो फिर हमें भी महान लोकतंत्र का दंभ भरना छोड़ देना चाहिए ।।
Ayshwarya
name of youtube channel - Ayshwarya Revadkar 
visit for audio video of this poem
https://youtu.be/u700kFUiGdU

5/29/18

आमचे रुग्णालय


भुलीच्या औषधाच्या गुंगीतून मी हळूहळू बाहेर येत होते. जड झालेले डोळे उघडायचा प्रयत्न केला, तेव्हा समोर माझे मित्र डॉ. नागुलन आणि डॉ. भारती, दोघे दिसले. लक्षात आले की मी आमच्या उमंगच्या ऑपरेशन थिएटरच्या बाजूच्या खोलीत, जिथे रुग्णांना शस्त्रक्रियेनंतर काहीवेळ ठेवले जाते, तिथे बेडवर आहे. भूलीमुळे माझी छोटीशी शस्त्रक्रिया कधी झाली, ते मला स्वतःलाच समजले नाही. अर्धवट गुंगीत मी डॉ. नागुलनला पुन्हा पुन्हा एकच विचारत होते, “सर, हो गया ना ?” तो आणि भारती माझी मस्करी करत होते, “क्या madam, सुबह सुबह पिके आये हो हॉस्पिटल मे !” मग नर्सेस येऊन सलाईन बदलणे, वगैरे करत राहिल्या. भारती शेजारच्या बेडवर पुस्तक वाचत पहुडली. मी औषधाचा अंमल उतरेपर्यंत झोपून राहिले.
काही महिन्यांपूर्वी जिल्हाधिकार्यांनी डॉक्टर्स ट्रांझिट होस्टेलसाठी ६ सायकल विशेष निधीतून दिल्या. सर्व डॉक्टर्स जसा वेळ मिळेल, तसे सायकलिंग करायला दूरदूरपर्यंत जातात. आमच्या जिल्हा रुग्णालयापासून उजवीकडे २ किमी आणि डावीकडे २ किमी, असे बिजापूर शहर पसरले आहे. डावीकडे २ किमी वर जिल्हाधिकारी ऑफिस लागते, तेथून आणखी पुढे बडमिंटन कोर्ट, पोहण्याचा तलाव, शासकीय विश्रामगृह, मधुबन नावाचा जुना ढाबा असे पोइंटस लागतात. तेथून आणखी एक किमी पुढे जिल्हाधिकारी निवासस्थान लागते. मग नवोदय विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, डी.ए.वी. स्कूल व कॉलेज लागते. तेथून डावीकडे आत गेले की मांझीगुडा नावाचे सुंदर गाव लागते. तेथून आणखी पुढे जाऊन, ३-४ गावे ओलांडून एक गोल राउंड मारला, की पुन्हा बिजापुरमध्ये येता येते. जिल्हा रुग्णालयाच्या उजवीकडे बाजार, पेट्रोल पंप, बस स्थानक, आणि सर्वांचा मनपसंत दंतेश्वरी ढाबा लागतो. डाव्या दिशेला ४५ किमी भैरमगड, आणि ८० किमीवर दंतेवाडा जिल्हा लागतो, तर उजवीकडे ६० किमीवर भोपालपट्टणम, मग इंद्रावती आणि इंद्रावतीच्या पलीकडे महाराष्ट्रातील पाथागुडम गाव व सिरोंचा जिल्हा लागतो. भोपाल पट्टणम पासून दक्षिणेकडे तेलंगणा लागते. बिजापूर शहराच्या चारी दिशांवर CRPF च्या चार बटालियनचे काम्प्स आहेत.(नंबर्स)
सायकलिंगला सर्व निघतात, तेव्हा काही मेन रोडने डावीकडे नवोदय विद्यालय, नेमेडकडे जातात, काही आजूबाजूच्या छोट्या गावाकडे जातात. उजवीकडे बस स्थानक संपले की चढ उतार आहे, पुढे घाट सुरु होतो. याला सारे “घाटी” म्हणतात, कधी सर्व इकडे फिरायला जातात. घाटी संपले की मोदकपाल नावाचे गाव लागते, तिथे CRPF साठी साटेलाईट फोन आहे. बऱ्याचवेळा, बिजापूरमधे दोन-दोन दिवस नेटवर्क निघून जाते, तेव्हा महत्वाचा फोन अथवा इमेल करण्यासाठी आम्ही सारे मोदकपाल इथे जातो.
मला सायकलिंग आवडते, दिवसभराचा कामाचा ताण, चिंता, प्रश्न याने डोके भणभणते तेव्हा एकटीने मी दूरवर सायकलिंगला जाते तेव्हा ते मेडीटेशन होते. निसर्गाच्या सहवासात मनातील सर्व तणाव अलगद निवळत जातात आणि परतून येईपर्यंत मन शांत प्रसन्न होऊन जाते. त्यात मला माझीगुडा हे गाव खूप आवडते. गावात पोहोचताच एक भला थोरला डेरेदार, असंख्य पारंब्यांचा वडाचा वृक्ष लागतो. फोटोत मावतही नाही त्याचा पसारा. तेथील घरेही निळ्या, हिरव्या रंगात रंगवलेली. घरांच्या दारात त्या त्या मोसमाची झाडे, वेली, फळे, फुले, भाज्या लावलेली. छोटेसे गाव संपले की पुढे दूर दूर पसरलेली शेते. खडबडीत रस्ता, एखादा ट्राक्तर, सायकलीवरून जाणारी पोरे, लगबगीने चालणारी एखादी स्त्री. सध्या उन्हाळ्यात लालभडक फुललेले पळस. तेथून दिसणारा पहाड, सोबत मावळतीचा लाल गोळा आणि केशरी आकाश. ते सारे पाहताना भान हरपून जाते. घरची आठवण, चिंता, कोणाशी भांडण सारे विसरायला होते. मग प्रसन्न मनाने परतायचे. इथपर्यंत येऊन जाऊन ८-१० किमी सायकलिंग आरामात होते. गेले काही दिवस मी वेड्यासारखी सायकलिंग करत होते. सायकलचे सीट खूप कडक होते, ते घासून जखम झाली. त्यात रविवारी मी दंतेवाडयाला ‘बचपन बनाओ’ या संस्थेतील माझे मित्र मैत्रीण ज्योती आणि प्रणित यांना भेटायला गेले. दुसऱ्या दिवशी सकाळी आम्ही तेथून २० किमीवर असणाऱ्या ‘ढोलकल’ या ठिकाणी ट्रेकिंगसाठी गेलो. ढोलकल येथील पहाडावरचा गणपती प्रसिद्ध आहे. नवव्या-दहाव्या दशकातील सुंदर गणेश मूर्ती इथे जंगलाने वेढलेल्या डोंगराच्या माथ्यावर विराजमान आहे. याची गोष्टही गमतीशीर आहे. (स्टोरी ऑफ ढोलकल ) फेब्रुवारी महिना. पानगळ झालेली. सकाळी ९-१० लाच कडक उन्हे पडलेली. त्यात दगड चढून, त्यावर घासून माझे दुखणे वाढले. ११ वाजता आम्ही परत उतरायला सुरुवात केली. आम्ही चारच लोक होतो, त्यात वाटाड्या नाव. आमचा मित्र लिंबाजी, ज्याला गुडघ्याचा आजार आहे, जिद्दीने पूर्ण पहाड चढला होता. उतरताना मात्र त्याला त्रास होऊ लागल्याने, तो आणि वाटाड्या “नाव ” दोघे मागे राहिले, ते सावकाश येत होते. मी आणि ज्योती गप्पा करत पुढे गेलो आणि बराच वेळाने लक्षात आले की आम्ही रस्ता चुकलोय. १ तासाच्या उतरणीसाठी आम्हाला रस्ता भटकल्याने चार तास लागले. उन्हाने चांगलाच त्रास झाला. तेथून परत येताना रस्त्याच्या कडेला सल्फी विकणारे लोक दिसले. इथे वेगवेगळ्या प्रकारचे, झाडांच्या रसापासून बनवलेले स्थानिक मद्य भेटते. महुआ, सल्फी, ... मला बऱ्याच दिवसापासून सल्फी चाखायची होती. आंबट चिंबट ताकासारखे लागणारी सल्फी दोन घोट प्यायली. संध्याकाळी साडे सहाच्या सुमारास, ज्योती आणि प्रणितचा निरोप घेऊन, माझ्या कारने मी दंतेवाडा सोडले. बिजापुरला पोहोचेपर्यंत अंधार पडला होता. अंधारात एकटीने परतताना जाम भीती वाटत होती.
दुसऱ्या दिवशी हॉस्पिटलमधे कळले, की काल बिजापूरच्या रोडचे काम करणाऱ्या ठेकेदाराचे अपहरण झाले आणि आज पहाटे बिजापूरपासून काही अंतरावर मेन रोडवरच त्याला गोळी घालून मारण्यात आले. त्याची डेड बॉडी पोस्टमोर्टेमसाठी आमच्या जिल्हारुग्णालयात आल्याने सर्वत्र तीच चर्चा चालली होती. माझी मैत्रीण भारती आणि डॉ. नागुलन त्यासाठी गेले होते. ते ऐकून मी घाबरले, कारण काल रात्री मी त्याच रस्त्याने आले होते.
सोमवारपासून मला थंडी ताप सुरु झाला, जखमेच्या वेदनेने खुर्चीत बसणे अशक्य झाले होते. मी स्वतः डॉक्टर असून, जखमेकडे दुर्लक्ष केले आणि भरपूर पस भरून दुखणे चांगलेच वाढले. भुल देऊन, छोटी शस्त्रक्रिया करून पस काढावा लागणार होता. पण मी तयार नव्हते. मला घरी जाऊ वाटत होते. परंतु इतका लांबचा प्रवास अशा स्थितीत मला शक्य नव्हता. इथे बिजापूरमधे, जिथे मी स्वतः रुग्णांवर शस्त्रक्रिया करते तिथे स्वतः रुग्ण बनणे, याची लाज वाटत होती. मेसचे जेवण खाऊ वाटत नव्हते. या काळात भारती सतत सोबत राहिली. तापाच्या गुंगीत मी झोपून रहायचे तेव्हा आमची होस्टेलची मावशी (नाव) येऊन सर्व खोली स्वच्छ करत होती, कपडे धुवून, सुकवून घडी घालून ठेवत होती. मेस मधली बबली मी मागेल ते बनवून आणून द्यायची. शेवटी बुधवारी दुखणे असह्य झाले तेव्हा मी डॉ. नागुलनला शस्त्रक्रिया करायची विंनती केली. माझ्या नर्सेस, शिल्पा, प्रेमलता, प्रियांका, वेदिका, साऱ्याजणी माझ्यासाठी उमंगच्या ऑपरेशन थिएटरमधे आल्या. मी स्वतः एक सर्जन असूनही, मला मात्र इंजेक्शन्सची प्रचंड भीती वाटते. मी रडत होते आणि माझ्या नर्सेस नाजूक हातानी मला सुई लावत होत्या. भुल तज्ञ डॉ. गुप्ता मदतीसाठी बाहेर थांबले. मी आत येऊन, ज्या टेबलवर माझे रुग्ण झोपतात, तिथे झोपले. डॉ. भारतीने मला भुलीचे इंजेक्शन दिले आणि माझ्या जाणीवा तात्पुरता बंद झाल्या. शस्त्रक्रियेनंतर दोन दिवसातच मी पूर्ण बरी झाले. त्यादिवशी मला पहिल्यांदाच एक नवीन गोष्ट जाणवली. सतत राबणाऱ्या, स्वतःच्या शरीराला आराम न देता, अथकपणे कष्ट करत राहणाऱ्या माझ्या स्त्री रुग्णांना, जेव्हा आम्ही डॉक्टर्स, नर्सेस भरती करतो, काही शस्त्रक्रिया करतो, त्यांची निरपेक्ष काळजी घेतो, त्यांना सक्तीची विश्रांती घ्यायला लावतो, तेव्हा त्यांनाही खरेच मनापासून चांगले वाटत असेल. आदिवासी रुग्ण जास्त दिवस रुग्णालयात भरती होयला तयार नसतात. बऱ्याचवेळा आमची स्त्री रुग्ण गंभीर आजारी असते आणि तिचे मात्र “घर मे बच्चे है, बहोत काम है, छुट्टी दो,” असे रोज टुमणे चालू असते. त्यांना खूप समजावून सांगितल्यावर बऱ्याचवेळा राहतात, तर कधीकधी न सांगता निघून जातात. असे निघून जाणारे रुग्ण कधी परत येतच नाही, तर काही खूप गंभीर स्थितीत परत येतात. एकदा एका स्त्रीचे बाळ उलटे म्हणजेच पायाळू असल्याने मी तिला सिझर करावे लागेल असे समजावले, रात्रीतून ती निघून गेली. काही दिवसांनी बाळ अडकलेल्या स्थितीत परत आली, मग तातडीने तिची शस्त्रक्रिया करावी लागली. अशा रुग्णांचा पत्ता आम्ही फिल्डवरील मितानी, ANM नर्सेसना देतो, रुग्णांची फिल्डवर काळजी घेणे, गरज पडली की तातडीने रुग्णालयात परत आणणे, याची जबाबदारी त्यांच्यावर सोपवतो.
आमचे रुग्णालय सरकारी असूनही आधुनिक, सर्व सुविधापूर्ण आणि महत्वाचे म्हणजे खूप स्वच्छ आहे. मी काही खाजगी रुग्णालयेही पाहिली आहेत, जिथे बाहेरून चमक धमक असते परंतु आत मात्र गबाळा कारभार असतो. त्यामुळे आमच्या आदिवासी रुग्णांसाठी असलेल्या शस्त्रक्रिया टेबलवर झोपताना मला थोडेही घाण वाटले नाही. माझी मैत्रीण डॉ. भारती एक चांगली डॉक्टर आहे हे मला स्वतःला माहित असल्याने, तिच्याकडे भुलतज्ञ डिग्री नसली तरीही, मी तिलाच भुल द्यायला लावली. डॉ. नागुलन माझा जवळचा मित्र आणि त्याहीपेक्षा जास्त, मी पाहिलेल्या सर्जन्सपैकी सर्वोत्तम सर्जन असल्याने मी विश्वासाने त्याच्यावर सर्व भार टाकला. माझ्या नर्सेसने माझ्या कुटुंबीयासारखी माझी काळजी घेतली.
तो पूर्ण आठवडा एक वेगळा अनुभव ठरला. घरापासून, कुटुंबापासून इतके दूर असतानाही, मी ते दुखणे निभावून नेले, ते माझ्या मित्र मैत्रिणीच्या, नर्सेसच्या प्रेमामुळे. मागील वर्षी, घर सोडून, बिजापुरला येताना भीती होती, मी एकटी राहू शकेन का. घरच्यांना सतत चिंता असते, ही एकटी कशी राहतेय. कधी ओळखीचे लोक म्हणतात, घर सोडून इतक्या लांब जाऊन राहणे हा मूर्खपणा आहे. कोणी फुकटचा सल्लाही देते, सामाजिक कार्याचे खूळ डोक्यातून काढून टाका, ज्यांच्यासाठी तू काम करशील, त्यांना तुझी काही किंमत नसते. मला स्वतःलाही बऱ्याचवेळा एकटेपणाची भीती घेरून टाकते.
परंतु जेव्हा गरजेच्या वेळी इतके सारे लोक धावून येतात, कुठल्याही अपेक्षेविना प्रेमाने मदत करतात, तेव्हा माझा माणुसकीवरचा विश्वास बळकट होतो. माझा असा अनुभव आहे, जिथे जिथे मी गेले आहे, तिथे तिथे माझी काळजी घेणारे, मला जपणारे, खाऊ पिऊ घालणारे लोक मला भेटले आहेत. कधी बिजापुच्या आजूबाजूच्या गावात भटकायला जाते, तेव्हा लोक बोलवून चहा पाजतात, खाऊ घालतात. पुणे सोडून गडचिरोलीला ‘सर्च’ संस्थेत गेले, तेव्हा डॉ. अभय आणि डॉ. राणी बंग यांनी मुलीप्रमाणे मायेची वागणूक दिली, त्यांच्यामुळे माझ्या आयुष्याच्या बद्दलच्या जाणीवा स्पष्ट झाल्या. डॉ. योगेश दादा यांचे नेहमी प्रोत्साहन आणि पाठबळ राहिले. सर्चच्या परिसरातील कार्यकर्त्या लोकांच्या कुटुंबांनी भरभरून कौतुक आणि प्रेम केले. बार्शीचे घर सोडून, बिजापुरला यायचा निर्णय घेताना, डॉ. अय्याज सरांवर डोळे झाकून विश्वास ठेवला आणि इथे येऊन माझी ही अंधारातील उडी योग्य असल्याचा अनुभव आला.
जग चांगले आहे की वाईट आहे, हा प्रश्न सर्वांनाच पडत असतो, मलाही पडतो. पण जेव्हा आपण चांगल्या मनाने काम करत असतो, तेव्हा नेहमी चांगलेच लोक भेटत राहतात. माझा मागील ‘बेच्चो’ हा लेख वाचून खूप लोकांनी कौतुक केले, “तू ग्रेट आहेस,’ अशा अनेक प्रतिक्रिया मिळाल्या. खरेतर माझ्यापेक्षा कितीतरी हुशार आणि चांगली शस्त्रक्रिया करणारे डॉक्टर्स आहेत, माझी डिग्रीही साधी आहे. पण मला वाटते, कोणी ग्रेट वगैरे नसते. तर तुम्ही इतरांसाठी जेव्हा कुठलेही काम करता, चांगल्या हेतूने मदत करता, ते तुम्हाला ग्रेट बनवते. तुमचे निर्णय, तुमची इतरांप्रती संवेदनशीलता आणि तळमळ, हे तुम्हाला ग्रेट बनवते.
दुखण्यातून बरी होऊन पुन्हा कामाला सुरुवात झाली. एका पार्टीत चिकन खाताना, दात तुटला. दाताच्या दुखण्याची मला प्रचंड भीती वाटते. डॉ. कुंवर सरांना म्हटले, मी जगदलपुरला जाईन. सर म्हटले, “घरकी मुर्गी दाल बराबर मत समझो. अपना डेंटिस्त डॉ. मनोज अच्छा है. उससे करवालो.” भोपालपट्टणम च्या डॉ. मनोजने मला व्यवस्थित दातात फिलिंग करून दिले.
कधी कोणी म्हणते, सरकारी रुग्णालयात इतका खर्च करायची काय गरज ? साधे पुरेसे आहे की. मग आम्हाला राग येतो, गरिबांना अधिकार नाही का प्रशस्त, सुविधापूर्ण आणि स्वच्छ रुग्णालय उपलब्ध असण्याचा ? एकदा बिजापुरमधील कोणी एक सरकारी अधिकारी व त्यांची बायको रुग्णालय पहायला आले. त्या बाई म्हणाल्या, “इतके मोठे आणि चांगले रुग्णालय बांधले आहे जिल्हाधिकारी तांबोळी सरांनी. पण हे आदिवासी लोक घाण करतात.” मनात म्हटले, “बाई ग, हे आदिवासी लोकांच्या हक्काचे रुग्णालय आहे.” कधी अशा शिक्षित लोकांपेक्षा माझे आदिवासी लोक मला जास्त सामाजिक आणि जवळचे वाटतात.

दुपारी ओपीडी संपल्यानंतर सामसूम झाली होती. मी मुख्य इमारतीत फोनवर बोलत उभी होते, तेव्हा एक आदिवासी माणूस, त्याच्या बायको-पोरासोबत आला. इथे सरकारी रुग्णालय कुठे आहे, म्हणून मला विचारले. मी त्याला सांगितले, की बाबा, तू उभा आहे, ते हेच आहे. तो म्हणाला, नाही, हे तर खूप मोठे रुग्णालय दिसतेय. माझ्याकडे पैसा नाही. गरीब लोकांचा इलाज कुठे होतो, ते रुग्णालय मला दाखवा. मग मी त्याला समजावले, की इथे मोफत इलाज होतो आणि त्याला आवश्यक त्या ठिकाणी नेऊन सोडले.

4/18/18

एकटेपणा

कधी कधी आपण असतो गर्दीमध्ये आणि अचानक धावून येते अंगावर अटळ एकटेपणाची जाणीव नकळतपणे.. त्या जाणिवेला कधी असते जबाबदार आपल्याच मनीचे वैराण प्रदेश. तर कधी मात्र दुसरेच लोक जाणीव करून देतात या एकटेपणाची.
म्हणजे आपण खूष असतो कधी एखाद्या पार्टीमधे किंवा गातअसतो, नाचत असतो, हरवलेले असतो आनंदात मित्र-मैत्रिणींसोबत.
अचानक एखादी व्यक्ती अशी काही वागते किंवा बोलते किंवा करते, कि फटकन शुद्धीवर येतो आपण.
भीती वाटते मला अशा लोकांची, जे गर्दीमधेही तुम्हाला अगदी एकटे एकटे करून टाकतात.
yes, I am scared of people, who make me feel utterly lonely, in middle of party.

एखादी जवळची मैत्रीण असते. तिच्याजवळ मन मोकळे करून सारं सारं तिला सांगावं आणि  मग तिने त्याचाच वापर करुन घाव द्यावेत मनावर.
अगदी मामुली घाव असला तरीही वर्मी बसतो, मैत्रिणीचा घाव, तिला सार्या खाणाखुणा ठाऊक, घाव कसा चुकणार ?
तिला विश्वासाने सांगावे, मला 'तो' आवडलाय. त्याच्याशी मैत्री करायचीय. नंतर पहावे  तर ती त्याच्यासोबत इतकी रंगलेली कि त्यांना इतरांचा विसर पडावा. तिने त्याला आपल्यापासून अलगद तोडावे, जिंकल्याच्या आनंदात छद्मी हसावे आणि हताशपणे पाहत विचार करावा, मैत्रीण इतकी दुष्ट वागू शकते ?
आपण आणखी एकटे. .

भीती वाटते मला, ज्याला जवळचे मानून आपण विश्वास टाकतो, त्याच्याच हातात सोपवतो आपण सुराही, हृदयावर वार करायला.

अशा लोकांची भीती वाटते, जे तुमच्यासमोर तर कौतुकाच्या पायघड्या अंथरतात, पण लोकांसमोर मात्र तुमचा विदूषक बनवतात.

आणि अशाही लोकांची भीती वाटते, जे जातात तुम्हाला एकटेपणाच्या खाईत लोटून, जेव्हा तुम्ही जिवाच्या आकांताने मारत असता त्यांना काही क्षणांच्या सोबतीसाठी हाका.

हेच असते का अटळ सत्य? एकटेपणा एकट्यानेच भोगत जाणे ?

1/30/18

छत्तीसगड

सध्या मी छत्तीसगड या राज्यात, आदिवासी बहुल व नक्षल ग्रस्त अशा भागात, बिजापूर या ठिकाणी, सरकारी जिल्हा रुग्णालयात 'स्त्री रोग तज्ञ' म्हणून काम करत आहे. इथे लोकांना असंख्य समस्या आहेत. कुपोषण आणि आरोग्याच्या असंख्य प्रश्नांनी, दररोजच्या मरण्याने इथले आदिवासी ग्रस्त आहेत.या सर्वात एक आशेचा किरण आहे, तो म्हणजे २ वर्षापासून इथे कार्यरत असलेले जिल्हाधिकारी डॉ. अय्याज तांबोळी, ज्यांनी आरोग्य, रस्ते, रोजगार व शिक्षण या क्षेत्रात अनेक वेगवेगळी कामे राबवून, विकास घडवून आणल्याने, या प्रदेशात एक नवीन आशादायी बदल होत असल्याचे चित्र पाहायला मिळतेय. अय्याज सरांच्या कामाबद्दल माझा दीर्घ लेख साधना साप्ताहिकाच्या १२ जुलै २०१७ च्या अंकात प्रसिद्ध झाला होता. तो मी इथेही प्रसिद्ध करेन. तसेच अलीकडे माझा मित्र मकरंद दीक्षित याचाही लेख २ भागामध्ये, लोकप्रभाच्या १९ व २६ जानेवारी २०१८ च्या अंकात प्रसिद्ध झाला आहे. मकरंद मुंबई चा असून, त्याने पूर्ण वेळ सामाजिक कामात वाहून घेतले आहे. डिसेंबरमधे १० दिवस तो बिजापुरला येऊन राहिला आणि त्याला आलेल्या अनुभवावर त्याने लोकप्रभा मधे खूप सुंदर लेख लिहिला आहे.
मला आयुष्यात ध्येयाने वेडावलेली, अफाट काम करून दाखवणारी, स्वतःची बुद्धी व उर्जा समाज हितासाठी वापरणारी माणसे भेटली की मी भारावून जाते अशा व्यक्तींच्या दर्शनाने. मग ते डॉ. अभय बंग, डॉ. रानी बंग असोत, डॉ. प्रकाश आमटे असोत, विकास आमटे असोत किंवा आमचे छत्तीसगडस्थित बिजापुरचे जिल्हाधिकारी डॉ. अय्याज तांबोळी असोत. अशी माणसे स्वतः तर मोठे कार्य घडवातातच पण दुसऱ्यासाठीही एक मोठा आदर्श निर्माण करतात.
इथे छत्तीसगड मधे काम करताना, डॉ. अय्याज तांबोळीची कार्यशैली आणि मैत्री जवळून पाहायला मिळाली. त्यांच्यासाठी लिहिलेली ही कविता.


हिरवं हिरवं जंगल
दाट दाट झाडी
कमळांनी भरलेले तालाब
आभाळाला टेकणारे महाकाय वृक्ष
या साऱ्या उत्कट निसर्गात
गर्द हरवलेली माणसांची
छोटी छोटी खेडी..घरे.
आणि या सगळ्यावर उमटलेली
तुमच्या शुभ्र कर्तृत्वाची मोहोर
हे सारं सारं तर आवडतं मला..


उघड्या नागड्या पोरांना
छातीशी धरणार्या
अतिसुंदर आणि अतिकठीण आया.
पोटातील भूक गच्च दाबून
गोड हसणार्या आदिवासी बाया..
जंगलात लाकूड, करवंदे, महूआ
ढुंढाळणारे हे जंगल वासी.
या सर्वांवर मायेची पाखर धरणारे
त्यांच्या जगण्याचा टेकू बनणारे ,
आधार देणारे तुमचे काम..
त्या कामामागचा तुमचा कळवळा
तुमची दूरदृष्टी
तुमचा सारासार विचार
हे सारं सारं तर आवडतं मला..


तुमच्याकडे कोणतीही अडचण
घेऊन येणाऱ्या प्रत्येकाला
तुमच्याकडून
मिळणारा दिलासा
एखाद्या अवघड समस्येवर
तुमच्याकडे असलेले असंख्य उपाय
समोरच्या व्यक्तीला समजून घेऊन
तुमच्या विशाल अंतरंगात
सामावून घेणारे
तुमचे प्रेमळ, सहज भान
तुमचे हसून बोलणे,
सांभाळून घेणे
हे सारं सारं आवडतं मला..

हेच तर बळकट करते आयुष्यावरची श्रद्धा
आणि तुमच्यावरचा विश्वासही.